एक तरफ कैशलेस इंडिया का नारा, दूसरी तरफ UPI पर सरचार्ज! डिजिटल पेमेंट करने वालों की जेब पर पड़ेगा नया बोझ?
सरकार डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दे या सरचार्ज बढ़ाकर ग्राहकों को नकद लेनदेन की ओर धकेले? व्यापारी और ग्राहक दोनों के सामने बड़ा सवाल
बस्ती। एक तरफ सरकार देश को कैशलेस और डिजिटल इकोनॉमी की ओर ले जाने की बात करती है, लोगों से ज्यादा से ज्यादा UPI और डिजिटल पेमेंट अपनाने की अपील की जाती है, वहीं दूसरी तरफ UPI भुगतान पर सरचार्ज की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सवाल सीधा है—अगर डिजिटल पेमेंट पर अतिरिक्त चार्ज लगेगा तो उसकी मार आखिर किस पर पड़ेगी? ग्राहक भुगतान करेगा या व्यापारी? और अगर इसका बोझ ग्राहक की जेब पर डाला गया तो फिर डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की पूरी मुहिम का क्या मतलब रह जाएगा?
आज आम आदमी सुविधा के लिए नकदी की जगह मोबाइल से भुगतान कर रहा है। लेकिन यदि हर भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़े तो यही सुविधा धीरे-धीरे जेब पर बोझ बन सकती है।
कैशलेस का सपना या सरचार्ज का झटका?
एक ओर डिजिटल भुगतान को आसान, सुरक्षित और सुविधाजनक बताया जा रहा है, दूसरी ओर शुल्क की व्यवस्था की खबरें लोगों के बीच नाराजगी पैदा कर रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या डिजिटल भुगतान करने वाले ग्राहक को सुविधा के नाम पर अतिरिक्त कीमत चुकानी होगी?
यदि व्यापारी पर शुल्क का दबाव बढ़ता है तो वह भी अतिरिक्त लागत से बचने के लिए नकद लेनदेन को प्राथमिकता देने की कोशिश कर सकता है। और यदि शुल्क ग्राहक से वसूला गया तो सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
यानी मामला चाहे इधर हो या उधर—सवाल आम ग्राहक और छोटे व्यापारी पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का है।
सरकार करे स्थिति साफ, आखिर UPI पर सरचार्ज क्यों?
जरूरत इस बात की है कि संबंधित एजेंसियां स्पष्ट करें कि UPI भुगतान पर किस प्रकार का सरचार्ज लागू है, किन लेनदेन पर लागू है और उसका भुगतान कौन करेगा।
क्योंकि जनता का सवाल साफ है—जब डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए कहा जा रहा है, तो उसी डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त बोझ क्यों?
कैशलेस व्यवस्था को बढ़ावा देना है तो डिजिटल भुगतान को बोझ नहीं, भरोसे और सुविधा का माध्यम बनाना होगा।












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